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नज़्म

टूटते हुए तारे

हर्ष ठाकुर
Jun 13, 20221 min read

जिस तरह तारों की रौशनी को हम तक पहुंचने में वक़्त लगता है
यानी हम अभी जैसे तारों को देख रहे हैं
वो ऐसे सदियों सालों पहले थे
अब शायद वो वैसे नहीं हैं
शायद टूट चुके हों
या पता नहीं
वैसे ही तुम्हारी याद है
जो कि तुम जैसी सदियों पहली थी उस पर आधारित है
तुम्हारा चेहरा
तुम्हारा बदन
तुम्हारी आवाज़
तुम्हारी आदतें
तुम्हारी बातें
सब कुछ पिछले जनम की लगती हैं
पर दिल को टिमटिमाते तारों की तरह
छलावा होता है
की ये सब अभी हो रहा है
दिल भी बिल्कुल उन आशावादी लोगों की तरह है
जो टूटते हुए तारों को देख के दुआ मांगते हैं
जबकि वो कब के टूट चुके होते हैं
दिल में तमन्नाएं रौशनी की रफ्तार से दौड़ती हैं
पर इनका सफर भी रौशनी के सफर से कम नहीं।

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