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कविता

मेरी कविता

अभिषेक सैनी
Jul 14, 20211 min read

मैं मान्यताओं पर नहीं लिखता
मैं सभ्यताओं पर नहीं लिखता
मैं वेदना पर भी नहीं लिखता
मैं खुद पर लिखता हूँ
इसलिए नहीं कि खुद पर लिखना आसान है
लेकिन किसी और का घर जलाने से पहले
मैं अपने घर का हर हिस्सा जला देना चाहता हूँ
किसी का जिस्म उधेड़ने से पहले
अपने जिस्म का हर जर्रा उधेड़ देना चाहता हूँ
ताकि मुझे हर लम्हा ये ध्यान रहे
कि घर जल जाने या जिस्म उधड़ जाने का दर्द कैसा होता है
और किसी और पर लिखी कविता मेरी कविता बन जाये।

लेकिन,
मेरे इस दर्द को जान लेने के बाद,
वो दर्द मेरा हो चलेगा।
अब वो कविता किसी और की नहीं हो सकती
वो कविता फिर मेरी ही बनकर रह जायेगी,
सच ही है कि सौ लोगों पर चाबुक चलाने के बाद,
चाबुक चलाने वाले का हाथ,
उन सौ से कहीं ज्यादा छलनी होगा।
मैं फिर अपना ही जिस्म उधेडूँगा, अपना ही घर जलाऊँगा
पहले से थोड़ा और ज्यादा
और इसी तरह एक दिन मेरे जिस्म के टुकड़े
मेरे घर की आग की आग में झुलस कर जल जायेंगे
और जो थोड़ा धुआँ उठेगा,
शायद कविता कहलायेगा।

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