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ग़ज़ल

किसी को क्या पता

जतिन सैनी
Jul 14, 20211 min read

किसी की शिकायतों का किसी को क्या पता
इस दिल की आफतों का किसी को क्या पता

धड़कनों की खड़क से ही रही सदमे में जाँ मेरी
भला मौत की आहटों का किसी को क्या पता

सब हैं हैंरा हम पथर से दिल लगाकर खुश हुए
अब पथर की चाहतों का किसी को क्या पता

खिले हैं जो सुबह-ओ-शाम गुल की तरह मुझमें
वो तेरी उन मुस्कराहटों का किसी को क्या पता

तमाम खुदाओं की लड़ाइयों से भरे इस खराबे में
'जतिन' इश्क़ की राहतों का किसी को क्या पता

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