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ग़ज़ल

ज़िन्दगी तनहाइयों में बसर करती है

गौतम निराला
Jul 14, 20211 min read

ज़िन्दगी  तनहाइयों में बसर करती है,
मुझमें मैं नहीं अब तूँ सफ़र करती है!

तमाम  उम्र  मैं  जिया हूँ अपने दर्द में,
तेरा  दर्द  मरहम  सा असर करती है!

मैं औ किसी पे दिल हारता क्यों नहीं,
तिरी  अदा में क्या है जफर करती है!

सारा सितम  मुझ  पर ही क्यों सनम,
तूँ  ही  ख़ुदाया  तूँ ही नज़र करती है!

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