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ग़ज़ल

जिंदगी है इनायत किसी और की

अभिषेक सैनी
Jul 14, 20211 min read

जिंदगी है इनायत किसी और की
किसलिए हो इबादत किसी और की
चाँद को है मोहब्बत किसी और से
चाँदनी है इनायत किसी और की
जो मरूँगा तो फिर ये कफ़स टूटेगा
मौत क्या है? जमानत किसी और की
इस जमाने मे क्या है मोहब्बत भला?
कोई लत है, ये आदत किसी और की
मैं यहाँ जुर्म करने से पहले जरा
कर रहा था शिकायत किसी और की
खुशबुएं कर रही हैं हवा में सफर
ये ग़ज़ल है अमानत किसी और की

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