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कहानी

गोवर्धनपुर का कांड

ज्योति यादव
Jul 14, 20218 min read

"अबे सुनो बिक्की, ई तुम्हार सिनेमा के वास्सेपुर नै न, बनारस बा, अगली बार हमाये सामने ऐसी बात कहे तो यही खोद के गाड़ देंगे, समझे?" संतोष ने तक़रीबन गुस्से से कांपते हुए कहा। "कैप्टेन हम तुम्हारे चमचे नहीं हैं आयी समझ? पूरा तमंचा तुम्हारे भेजे में ही खाली कर देंगे, अभी। अगली बार तुम्हारे गैया हमारे क्षेत्र में दिखाई पड गयी तो वापस नहीं आएगी।" बिक्की ने भी चिल्लाते हुए जवाब दिया। इस गाँव में आये दिन ऐसे प्रकरण होते रहना आम है जिससे दो फायदे हैं। पहला तो जब आपके पास बेईमानी का पैसा हो और कुछ काम न हो तो इस तरह के टाइमपास करके आपकी ज़िंदगी चलती है, दूसरा जो फायदा है वो आजतक कोई समझ नहीं पाया।

आइये स्वागत है आपका बनारस के गोवर्धनपुर में । गोवर्धनपुर बनारस के किसी आम गांव जैसा ही है, जिसके चारों तरफ शहरीकरण मुंह बाए खड़ा हुआ है पर ये एक जमीन का टुकड़ा उत्तर प्रदेश पुलिस के सिपाही की तोंद के मानिंद जस का तस है। चोरी हो या भाईसाहब खून हो जाये, मजाल है कि कभी वो तोंद टस से मस होती हो। लेकिन गोवर्धनपुर को दो बातें उसे पूरे बनारस से अलग करती हैं-

1; संतोष चौधरी उर्फ़ 'कैप्टेन असंतोष' और बीरेंद्र उपाध्याय उर्फ़ 'बिक्की पंडित' की वर्ल्ड फेमस दुश्मनी। जी वर्ल्ड फेमस इसलिए कि एक आम बनारसी को घंटा फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बनारस के बाहर भी कोई दुनिया है।

2; दूसरे पर यहां की आवाम है जो भारतवर्ष की तमाम जनता की तरह ही भोली है और आये दिन - 'हाय नेता हमाये नेता' का जाप करते हुए पायी जाती है।

कैप्टेन और बिक्की के बीच वर्चस्व की लड़ाई कई सालों की थी और आये दिन गाँव में हिंसात्मक भिड़ंत की खबरें अखबार में आती रहती थी।  गाँव के जवान लोग इन हिंसाओं को गाँव की प्रगति में अपना योगदान कहते थे। 'प्रगति में योगदान' का ये फैशन आजकल बाज़ार में काफी प्रचलित है। जैसे अपने घर में अमुक सीमेंट का इस्तेमाल करें तो आप ये योगदान दे सकते हैं या फिर अमुक ब्रांड के कपडे या फोन खरीद कर भी ये योगदान दिया जाता है। एक नया ट्रेंड पिछले कुछ दिनों में देखने को मिला है कि कई बार सरकार से सवाल नहीं पूछना और ५ बरसों के वादों का हिसाब नहीं मांगने को भी प्रगति में योगदान की तरह देख जाता है । गोवर्धनपुर गाँव के आजतक के इतिहास में ये योगदान कभी कैप्टेन और बिक्की के घर से नहीं दिया गया। ऐसे हर योगदान प्रकरण के बाद गाँव का तो पता नहीं पर इन दोनों की शानोशौकत में विशेष इजाफा ज़रूर हो जाता।

यहाँ के बौद्धिक समाज के प्रतिनिधि और तमाम सरकारी-गैर सरकारी NGO के संचालक महोदय श्री रंगनाथ चटर्जी जिन्हें गाँव के लोग प्यार से बौड़म दादा कहते हैं। बौड़म दादा गाँव की ऐसी हालत देख कर बहुत उदास रहते और और गांववालों को ये समझने की चेष्टा करते कि ये तो गेंहू के साथ घुन पीसने जैसी बात है और गांववाले इस बात से परेशां हो जाते कि जब बौड़म दादा के घर में कोई चक्की ही नहीं है तो उन्हें गेंहू और घुनों की इतनी चिंता क्यों है?

खैर अपनी अजीबोगरीब बातों और कांडों के साथ गोवर्धनपुर पंचायत पिछले कुछ सालों से बिक्की और कैप्टेन के परिवारों के बीच बंटती रही है। पंचायती और विधानसभा चुनावों के वक़्त बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कई छात्र गोवर्धनपुर में जागरूकता कैंपेन चलाते थे मगर BHU के इतने सालों के इतिहास में, मजाल है कि ये गाँव घड़ी भर के लिए भी अपने नेताओं से भटका हो? सूखा पड़े या बाढ़ आ जाये, यादवों का वोट समाजवादी पार्टी से खड़े होने वाले 'captain असंतोष' को मिलता रहा और ब्राह्मणों का जनता पार्टी के उम्मीदवार बिक्की पंडित को। क्यूंकि दलित संख्या में बहुत कम थे और उनके विकल्प उनकी संख्या से भी कम इसलिए वो कई बार ५०० रुपयों के लिए और कई बार एक बोतल शराब के लिए अपने वोट बेचते रहते। BHU के जागरूक छात्रों को कई बार इस गाँव से मार पीट कर भगाया गया है लेकिन किताब पढ़ने वाले ये विचित्र जीव तक़रीबन हर तीन महीने में एक बार संविधान की किताब हाथों में उठा के फिर पिटने और गालियां खाने चले आते।

कई सालों के बाद गोवर्धनपुर के राजनीतिक बाज़ार में एक नया प्रोडक्ट आया है जो इस बार के विधानसभा चुनावों में अपनी दावेदारी पेश करेगा। इस उम्मीदवार का नाम ठाकुर अर्जुन सिंह है जो यहां के पूर्व विधायक ठाकुर चिरंजीव सिंह  (बड़े ठाकुर) का बेटा है । आज़ादी के बाद देश को कांग्रेस का सबसे नायाब तोहफा ये भाई-भतीजावाद है । राजशाही के ख़त्म हो जाने के बाद भी खुदा कसम कभी उसकी कमी लगी ही नहीं। दादा, पिता और फिर पुत्र, विधायकी सत्ता का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में बिलकुल ऐसे होता जैसे राजा की गद्दी उसके पुत्र को बिना किसी योग्यता के भी सौंप दी जाती थी । खैर, बड़े ठाकुर अब उम्र के उस दौर में थे जहां से २० वर्ष पहले ही उन्हें भारतीय पुरातत्व विभाग की संपत्ति घोषित कर देना चाहिए था लेकिन जिस तरह से मर्द को कभी दर्द नहीं होता, एकदम वैसे भारत के नेता जब तक अन्त्य गति को प्राप्त नहीं कर लेते, युवा बने रहते हैं। ६०-६५ वर्ष की आयु वाले ऐसे होनहार युवा नेता भारत की संसद  पर सालों से कुंडली मार के बैठे हुए हैं। अर्जुन सिंह यानि छोटे ठाकुर का ये चुनाव जीतना बेहद आवश्यक था क्यूंकि जिस देश में पीएचडी धारकों को भी नौकरी का कोई आश्वासन नहीं दीखता हो, वहां तीसरी फेल एक चालीस वर्षीय आदमी के पास नेता बनने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं होता । छोटे और बड़े ठाकुर चुनाव जीतने के लिए एक रूपरेखा के निर्माण में लग जाते हैं जिसके तहत captain असंतोष और बिक्की पंडित को भी विधायक निवास में तलब किया जाता है । हालाँकि ठाकुर खानदान भी इनकी दुश्मनी से वाक़िफ़ था लेकिन इन दोनों के लालची स्वभाव और अवसरवादिता से भली भांति परिचित था। बड़े ठाकुर ने अपना तमाम राजनीतिक अनुभव इन दोनों को तैयार करने में लगा दिया था। अंततोगत्वा ये तय हुआ की इस बार के विधायकी के चुनावों में दोनों ही अर्जुन सिंह को समर्थन देंगे। बिक्की पंडित की कीमत जहाँ कुछ बीघे हाईवे के किनारे वाली ज़मीन तय हुई थी वहीं कैप्टेन ने अपना ज़मीर पेट्रोल पंप की एजेंसी के लिए बेच दिया था।

इस पूरे प्रकरण से बेखबर कैप्टेन और बिक्की के समर्थक आज फिर अपने दोनों नेताओं के नाम पर गाँव में भीड़ गए थे। किसी का सर फूटा तो कोई अगले कुछ महीनो तक चलने लायक हालत में नहीं रहा लेकिन मज़ाल है कि दोनों तरफ के "देशभक्तों" की भक्ति में किसी भी तरह की कमी आयी हो। इस विवाद की खबर जब ठाकुर परिवार तक पहुँची तब उन्होंने कैप्टेन और बिक्की को मामला सम्भालने को कहा। पैसों और ज़मीन के मोह में अंधे लोगों को फिर अपने शुभचिंतकों और मौक़ापरस्त लोगों के बीच फ़र्क़ नहीं नज़र आता और ठीक यही कैप्टेन के साथ भी हुआ । इस हिंसक भिड़ंत का विरोध करते हुए कैप्टेन अपने समर्थकों से मिलने तक नहीं गए और बाकी लोगों को भी चुनावों की तैयारी में लगने को कहा । बड़े ठाकुर ने यहाँ पर एक चाल ये चली कि कैप्टेन और बिक्की को अलग अलग ये समझा दिया था कि आगामी चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन्ही की है। जिसका परिणाम यह हुआ कि अर्जुन सिंह भारी मतों से जीत गए । गोवर्धनपुर जैसे ही तमाम गाँवों से मिलकर बनी इस विधानसभा में ठाकुर परिवार की ओर से ऐसी कई चालें चली गयी थीं और ऐसे कई प्रलोभन दिए गए थे। चुनावों के परिणाम आने के बाद अपने अपने हिस्से का बटर चिकन खाने जब बिक्की और कप्तान विधायक निवास पहुंचे तो उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। जो ठाकुर साहब कल तक उनके आगे बिछ जाते थे वो आज उन्हें और उन जैसे तमाम और क्षेत्रीय नेताओं को पहचान भी नहीं रहे| दोनों ही छुटभैये नेता इस समय उतना ही ठगा हुआ महसूस कर रहे थे जितना पंचायती चुनावों के बाद उनके गाँव के लोग करते। अपनी ऐसी फ़ज़ीहत कराने के बाद दोनों ही अपने गाँव की तरफ लौटने लगे।

इन दोनों के अलावा एक और वर्ग इन सबसे बहुत हताश हुआ था वो थी गांव की वो भोली जनता जिसने गाँव की (या फिर सीधे कहें तो इन दोनों परिवारों की) प्रगति में जी तोड़ और कई बार हड्डी तोड़ योगदान दिया था। इस घटनाक्रम के बाद बिक्की और captain ने अपने भीतर के रावण को बहुत हद तक शांत कर लिया था। आज कई वर्षों बाद भी बिक्की और कप्तान के चर्चे गोवर्धनपुर और उसके बाहर सुनने को मिलते हैं। गोवर्धनपुर के तमाम तटस्थ टाइप की जनता अपने गाँव में घटित इस आधुनिक रामायण को जब-तब उद्धृत करना नहीं भूलती। गाँव के नए लड़के अब भी कभी कभी उस झगडे में हुए सर-फुट्टौवल को लेके ,बूढ़े हो चुके लठैत काका और ताऊओं को छेड़ देते हैं। और सच ही तो है, रामायण में भी ज़मीन की लड़ाई लड़ने वालों को उनके हिस्से की उपलब्धियां नहीं दी गयीं और गोवर्धनपुर में भी। वर्तमान मुख्यमंत्री का रामराज्य शायद गोवर्धनपुर में सबसे पहले आया।

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