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कविता

बेफ़िक्र

अर्पित गुप्ता
Jul 14, 20211 min read

वादे स्वयं से करके..
खुद ही भुला देता हूँ मैं !

सपने संजोता हूँ बेहतर कल के लिए,
और स्वयं ही बिखेर देता हूं मैं!

परिश्रम करूंगा ये सोचकर समय सारणी बनाता हूँ ,
फिर, कल कल मे टालता जाता हूँ मैं !

कभी कभार फिक्र भविष्य की भी होती है,
लेकिन सब कुछ टालता जाता हूं वर्तमान मे मैं!

कदाचित, कभी उद्देश्य एकाएक नजर आ जाता है,
तो, थोड़ा सा समझदार भी हो जाता हूँ मैं!

फिर कुछ वक़्त गुजरता है,
और वापस "बेफ़िक्र" हो जाता हूँ मैं!

वापस बेफ़िक्र हो जाता हूँ मैं!

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