एक गधे की आत्मकथा
"बनाकर गधों का हम भेस गालिब
तमाशा-ऐ-अहले-करम देखते हैं।"
अगर एक गधा अचानक इंसानों की तरह बोलने लगे और हमारे ही समाज की असलियत हमारे सामने रख दे, तो क्या होगा? क्या हम उसकी समझदारी की तारीफ़ करेंगे या अपनी कमियाँ उजागर होने के डर से उस पर लाठियाँ बरसाने लगेंगे? मशहूर प्रगतिशील लेखक कृश्न चंदर का लघु उपन्यास 'एक गधे की आत्मकथा' इसी दिलचस्प और तीखे सवाल से शुरू होता है। यह सिर्फ़ हँसाने-गुदगुदाने वाली कहानी नहीं है, बल्कि आज़ादी के बाद के भारत पर लिखा गया एक बेहद मारक सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है। एक सीधे-सादे जानवर की नज़र से लेखक ने हमें यह दिखाया है कि जिसे हम 'सभ्य और आधुनिक समाज' कहते हैं, उसके पीछे कितना पाखंड, स्वार्थ और खोखलापन छिपा हुआ है।
साहित्यिक रूपक के स्तर पर देखें तो इस उपन्यास का मुख्य किरदार—बाराबंकी का गधा 'धबड़'—महज़ एक चौपाया जानवर नहीं, बल्कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े उस आम आदमी का प्रतीक है जो दिन-रात पसीना बहाता है, सबकी सेवा करता है और बदले में सिर्फ़ उपेक्षा व मार पाता है। कृश्न चंदर ने बहुत होशियारी से इस पारंपरिक धारणा को उलट दिया है कि 'गधा' मूर्खता का पर्याय है। यहाँ गधा शिक्षित है, अख़बार पढ़ता है और दुनिया की विद्रूपताओं को गहराई से समझता है।
“एक मुसलमान या हिन्दू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता”
उपन्यास की शुरुआत में ही देश के बँटवारे के खूनी माहौल के बीच गधे का यह विचार तत्कालीन समाज की संकीर्ण मानसिकता पर सबसे करारी चोट करता है। धर्म और जाति के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाने वाले 'सभ्य' इंसानों के सामने यह बेज़ुबान जानवर कहीं अधिक मानवीय और विवेकशील नज़र आता है।
इस उपन्यास का एक अत्यंत विचारोत्तेजक पहलू आज़ाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था और लालफीताशाही की कलई खोलना है। जब एक ग़रीब और बेसहारा परिवार पर विपत्ति आती है, तो गधा व्यवस्था से न्याय और सहायता माँगने के लिए राजधानी के सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटने निकलता है। म्युनिसिपल कमेटी, श्रम विभाग, पुनर्वास विभाग और मत्स्य विभाग जैसे दफ़्तरों में गधे का जो अनुभव होता है, वह आज़ाद देश की तथाकथित कल्याणकारी व्यवस्था का सबसे वीभत्स चेहरा सामने लाता है। अफ़सरों और बाबुओं के लिए किसी ग़रीब की भूख, लाचारी या ज़िंदगी कोई मायने नहीं रखती; उनके लिए केवल नियम-क़ायदे, फ़ाइलों के चक्कर और अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर टालना ही सब कुछ है। व्यवस्था की यह जड़ता और संवेदनहीनता पाठक को हँसाते हुए भी भीतर तक बेचैन कर देती है।
इसके साथ ही, लेखक ने आज़ादी के बाद पनपे नए पूँजीवादी वर्ग और उसकी नग्न अवसरवादिता पर गहरा प्रहार किया है। जब गधा अपनी सादगी में प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मुलाक़ात कर लेता है, तो रातों-रात वह अख़बारों की सुर्ख़ियों और 'सेलिब्रिटी कल्चर' का केंद्र बन जाता है। इसके तुरंत बाद सेठ बरजूटिया जैसे धनपतियों का गधे के आगे-पीछे मंडराना दिखाता है कि पूँजी के लिए नैतिकता और आत्मसम्मान का कोई मोल नहीं होता। पच्चीस करोड़ के एक सरकारी ठेके के लालच में एक गधे को व्यावसायिक साझेदार बना लेना और अपनी पढ़ी-लिखी बेटी रूपवती का रिश्ता उससे तय करने को तैयार हो जाना उस बाज़ारू सोच का चरम उदाहरण है, जहाँ हर मानवीय संबंध केवल मुनाफ़े की तराज़ू पर तौला जाता है।
एक संभ्रांत क्लब में सौंदर्य प्रतियोगिता के प्रसंग के ज़रिए लेखक ने आधुनिक उपभोक्तावाद द्वारा स्त्री को एक 'उपभोग की वस्तु' बना दिए जाने की भी तीखी आलोचना की है। जहाँ तथाकथित बुद्धिजीवी और समाज के बड़े लोग महिलाओं के अंगों को किसी कारख़ाने के पुर्जों या कारों के मॉडलों की तरह नाप-तोल रहे थे, वहीं मुख्य निर्णायक बना गधा इस पूरे ढकोसले को सिरे से ख़ारिज कर देता है। वह कहता है कि असली सौंदर्य बाज़ार के लिपिस्टिक-पाउडर और कृत्रिम नुमाइश में नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए दिन-रात खटने वाली, मेहनत की रोटी कमाने वाली और अभावों के बीच भी मुस्कुराने वाली श्रमशील स्त्री में है।
शिल्प और भाषा-शैली की दृष्टि से कृश्न चंदर की यह रचना अत्यंत सजीव और सम्मोहक है। उन्होंने आम बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा, उर्दू के मुहावरों और समकालीन अंग्रेज़ी शब्दों का ऐसा सहज मेल किया है कि हर संवाद सीधे पाठक के दिल पर असर करता है। व्यंग्य यहाँ महज़ सतही लतीफ़ाबाज़ी नहीं है, बल्कि एक ऐसा धारदार हथियार है जो समाज की सड़ी-गली व्यवस्था की चीर-फाड़ करता है।
हालाँकि, एक निष्पक्ष साहित्यिक समीक्षा के तौर पर उपन्यास की कुछ कमियों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कई जगहों पर लेखक की अपनी प्रगतिशील विचारधारा इतनी हावी हो जाती है कि गधे का पात्र बनावटी लगने लगता है। मंच पर गधे द्वारा दिए गए लंबे, दार्शनिक और राजनीतिक भाषण कथा के स्वाभाविक प्रवाह को धीमा करते हैं। ऐसा लगता है मानो गधा पीछे छूट गया हो और लेखक स्वयं मंच पर आकर सीधे-सीधे भाषण देने लगे हों। यह उपदेशात्मकता उपन्यास के कथा-रस को कुछ पलों के लिए बोझिल ज़रूर बनाती है।
इन सीमाओं के बावजूद, 'एक गधे की आत्मकथा' हिंदी और उर्दू साहित्य का एक ऐसा कालजयी दस्तावेज़ है, जिसकी प्रासंगिकता समय बीतने के साथ और बढ़ गई है। यह उपन्यास पाठक के चेहरे पर मुस्कान लाते हुए उसके अंतर्मन में यह असहज सवाल छोड़ जाता है कि क्या केवल दो पैरों पर चलना, सूट-बूट पहनना और अफ़सरी भाषा बोलना ही इंसान होने का सबूत है, या हम अपने स्वार्थ, लालच और संवेदनहीनता के कारण उस बेज़ुबान जानवर से भी कहीं नीचे गिर चुके हैं?