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पुस्तक समीक्षा

एक सड़क सत्तावन गलियाँ

टीम हि.सा.सभा
Jun 4, 20263 min read

"इन धर्म मंड़लियों से लड़िए जो मेहनतकश लोगों को सोचने-समझने का मौका नहीं देतीं… ऊँची जाति के कहे जाने वालों से लड़िए जो आदमी को आदमी नहीं बनने देते… अफसरों से लड़िए जो पैसे हज़म कर जाते हैं… नेताओं से लड़िए जो जातिवाद के नाम पर वोट बटोरते हैं… घृणा फैलाकर चैन की नींद नहीं सोने देते… कितनी लड़ाइयाँ हैं… आँखें खोलकर देखिए।”

सन् 1956 में लिखा गया कमलेश्वर का यह पहला उपन्यास उस समय के एक छोटे से कस्बे की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का चित्रण करता है।

बड़े शहरों को मिलाने वाली सड़क रीढ़ की हड्डी की तरह थी, जिसमें सत्तावन गलियाँ पसलियों की तरह आकार में आकर मिल गई थीं। इसी चौड़ी सड़क के दोनों ओर बस्ती बसी थी — पश्चिमी सिरे पर वकीलों एवं ज़मींदारों का, जबकि पूर्व की ओर छोटी जातियों और छोटे व्यापारियों का बोलबाला था।

उपन्यास पाँच मुख्य पात्रों के माध्यम से समाज के हाशिए पर बसे लोगों के रोज़मर्रा के संघर्षों और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करता है। जहाँ एक तरफ सरनाम सिंह जैसा पूर्व फौजी और डकैत परिस्थितियों के कारण अपराध की ओर धकेले जाने के बाद भी अंतर्मन के पश्चाताप और अपराधबोध से जूझता दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ रंगीले जैसा पेशेवर गवाह व्यवस्था के भ्रष्टाचार और समाज के अंधविश्वास के बीच हास्य के साथ जीने का हुनर सिखाता है। इसी समाज में बंसीरी जैसी वेश्या शोषण की शिकार होने के बावजूद आत्मसम्मान और गरिमा के लिए लड़ती है, जबकि शिवराज जैसा अनाथ ब्राह्मण कुमार पारिवारिक विखंडन के बीच अपनी अस्मिता और प्रेम की तलाश में भटकता है। वहीं बाजामास्टर जैसा उपेक्षित संगीत प्रेमी कला के प्रति समाज की हीन भावना का शिकार होकर अंततः पागलपन की हद तक संघर्ष करता है। ये सभी पात्र केवल अपने समय की सच्चाइयों को ही उजागर नहीं करते, बल्कि आज के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

आम बोलचाल की भाषा, आंचलिक लोकोक्तियाँ, मुहावरे और व्यंग्य के प्रयोग से कस्बाई-ग्रामीण जीवन का सुंदर चित्रण किया गया है। उपन्यास तत्कालीन सामाजिक पीड़ाओं और आम आदमी की चेतनाओं को मार्मिकता से उजागर करता है। लेखन में नाटकीयता के स्थान पर गंभीरता और मानवीय संवेदना को प्रमुखता दी गई है।

“दुनिया के भीतर एक छोटी-सी दुनिया बसाने की चाह हर एक में होती है…”

हिन्दी साहित्य में एक मील का पत्थर साबित हुए इस लघु उपन्यास में न आदर्श गाँव है, न ही आदर्श पात्र बल्कि विडंबना और दैनिक संघर्षों की सच्चाई है ,कस्बाई जीवन का सजीव चित्रण है — लोकगीत, त्योहार, रीति-रिवाज़ और ग्रामीण-शहरी संक्रमण की छवियाँ हैं। कमलेश्वर को अपनी माँ और जन्मभूमि जितनी प्रिय यह रचना सत्तावन गलियों को जोड़ने वाली उस सड़क के किनारे बसी बस्ती की संस्कृति, संघर्षों और लोगों की कहानियों के माध्यम से पाठकों को जीवन के यथार्थ के दर्शन कराती है और उन्हें सोचने पर विवश करती है।

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