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कहानी

स्मृतियों का समंदर

हर्षदा राजहंस
Apr 3, 202611 min read

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सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। रसोई से अदरक वाली चाय की महक पूरे घर में फैल चुकी थी। दीया चाय का कप लेकर बालकनी में बैठी थी, जहाँ हवा के हल्के झोंके उसके चेहरे को छू रहे थे। हाथ में चाय के कप की गर्माहट और दिल में कल रात की बातचीत अब भी उसे परेशान कर रही थी। पाँच साल की अवनि नाराज़ होकर सोई थी। "आप मुझसे प्यार नहीं करतीं मम्मा! डांस परफॉर्मेंस में भी नहीं आईं," उसकी वह उदास आवाज़ दीया के कानों में गूंज रही थी। दीया अपनी एक जरूरी दफ़्तर की मीटिंग के कारण अवनि का डांस परफोर्मेंस देखने नहीं जा पाई थी।

भीतर से अवनि की चिढ़ी हुई आवाज़ आई, "मम्मा! मेरा फ्रॉक नहीं मिल रही!" दीया ने अनमने मन से चाय का कप मेज पर रखा और हड़बड़ी से उठ गई। अलमारी की ओर बढ़ते हुए उसने कहा, "आ रही हूँ, बेटा।" अलमारी के दरवाज़े खोलते ही सामने कपड़ों के बीच रखा एक पुराना सिलाई बॉक्स गिरते-गिरते बचा। दीया ने उसे उठाया। बॉक्स के ढक्कन पर हल्की खरोंचें पड़ चुकी थीं, लेकिन यह अब भी माँ की यादों का एक अटूट हिस्सा था।

माँ इस सिलाई बॉक्स से कैसे न जाने कितने कपड़ों में जान डाल देती थीं। दीया को याद आया कैसे माँ कभी ब्लाउज की फिटिंग ठीक कर रही होतीं, तो कभी पापा के कुरते की फटी जेब सिल रही होतीं। हमेशा व्यस्त, हमेशा सबकी जरूरतें पूरी करती हुई। एक बार गर्मी की छु‌ट्टियों में दीया की स्केचिंग की प्रतियोगिता थी। वह पूरी रात जागकर अपनी पेंटिंग पूरी कर रही थी। "माँ, देखो न ये कैसी लग रही है?" उसने बार-बार माँ को पुकारा था। "बहुत सुंदर बेटा," माँ ने मुस्कुराकर कहा था, लेकिन उनकी आँखों में थकान साफ झलक रही थी।

प्रतियोगिता के दिन दीया ने पूरी उम्मीद के साथ मंच से दर्शकों में माँ को ढूंढा था लेकिन माँ वहाँ नहीं थीं। कार्यक्रम के बाद वह घर लौटी तो गुस्से में फट पड़ी, "आप कभी मेरे लिए समय ही नहीं निकालतीं! सबके माता-पिता आते हैं, बस आप नहीं!" माँ ने बिना कोई सफाई दिए चुपचाप दीया के सिर पर हाथ फेरा दिया। "आपको कोई फर्क नहीं पड़ता!" दीया ने ताने मारे। उस रात दीया को नींद नहीं आई। देर रात पानी लेने के लिए उठी तो देखा कि माँ सिलाई मशीन के सामने बैठी थीं। उनके पैरों के पास फैली एक लंबी थान थी जिसे वह नापकर काट रही थीं। "माँ, इतनी रात को क्या कर रही हो?" माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "तुम्हारे पापा की दवाईयों के पैसे जुटाने हैं बेटा। बस एक ऑर्डर पूरा कर रही हूँ।"

दीया की आवाज़ अटक गई थी। तब वह छोटी थी, लेकिन उस रात माँ की खामोशी में छिपा त्याग वह कभी नहीं भूल पाई। अचानक दीया की नज़र सिलाई बॉक्स में पड़े एक पुराने नीले रिबन पर गई। यही रिबन कभी उसकी स्कूल यूनिफॉर्म का हिस्सा था। माँ बड़े प्यार से उसके बालों में यह रिबन बाँधती थीं। वो ढीली सी गांठ... तब बहुत खलती थी।

लेकिन अगले ही पल अवनि की आवाज़ ने उसे वर्तमान में खींच लिया, "मम्मा! मेरा फ्रॉक मिला या नहीं?" दीया ने झटके से अतीत को झटकते हुए अलमारी की ओर देखा। थोड़ी तलाश के बाद गुलाबी फ्रॉक उसके हाथ में आ गई। "ये लो, मिल गई," उसने अवनि को देते हुए कहा। अवनि ने मुँह फुलाकर कहा, "इतनी देर क्यों लगाई मम्मा?" "बस जल्दी नहीं दिखी," दीया ने हँसते हुए उसकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश की। फ्रॉक पहनाकर उसने अवनि के बालों को जल्दी-जल्दी संवारा। "चलो, जल्दी से तैयार हो जाओ," दीया ने कहा और उसको जूते पहनाने में मदद की। गाड़ी में बिठाकर उसने अवनि को स्कूल के लिए रवाना किया और एक गहरी सांस ली।

जैसे-जैसे बस आँखों से दूर होती गई, दीया की आँखों में बीती यादों की हल्की नमी बढ़ती गई। माँ की वह भाग-दौड़, हर छोटी ज़रूरत का ध्यान रखना - तब दीया को मामूली लगता था। पर आज उसे वह सब समझ आ रहा था। माँ का हर दिन तो इसी भागदौड़ का हिस्सा था। शायद तब मैं वो प्यार नहीं देख पाई थी जो उनके हर काम में छुपा था। दीया गाड़ी की ओर से लौटते हुए बरामदे में खड़ी थी। हल्की हवा अब भी उसके बालों से खेल रही थी, लेकिन उसका मन अतीत की गलियों में भटकने लगा।

दीया के कॉलेज का आखिरी साल था। उसका सपना था कि वह दिल्ली की नामी आर्ट यूनिवर्सिटी में दाखिला ले और एक मशहूर पेंटिंग आर्टिस्ट बने। उसने जी-जान लगाकर तैयारी की थी। "माँ, मेरा सिलेक्शन हो गया है!" दीया ने खुशी से चहकते हुए घर में प्रवेश किया। उसकी आँखों में सपनों की चमक साफ साफ दिख रही थी। माँ खाना बनाते हुए पलटी और अपनी आँखों में हल्की उदासी छुपाने की कोशिश करते हुए फीकी मुस्कान के साथ बोली, "बधाई हो बेटा"। "बस अब एडमिशन की फीस भरनी है। पापा से बात कर लेंगे ना?" दीया ने उत्साह से कहा। लेकिन माँ चुप रहीं। उनके हाथ रोटी बेलते हुए थम गए थे। कुछ देर बाद जब दीया ने दोबारा पूछा तो माँ ने गंभीर स्वर में कहा, "शायद ये मुमकिन नहीं हो बेटा। घर के हालात ठीक नहीं है। तुम्हारे पापा की दवाईयों और छोटे भाई की स्कूल फीस में ही सब खत्म हो जाता है।"

दीया को यह सुनते ही गुस्सा आ गया। "माँ, आप हमेशा अपनी ज़िम्मेदारियों की आड़ में मेरे सपनों को मारती आई हो। आप कभी अपनी पहचान नहीं बना पाईं और अब मुझे भी उसी कैद में रखना चाहती हो।" माँ ने उसकी बातें चुपचाप सुनीं। उसके चेहरे पर कोई नाराज़गी नहीं थी, बस एक गहरी थकान और लाचारी झलक रही थी। "दीया, मैंने कभी नहीं चाहा कि तुम मेरी तरह सबकुछ त्याग दो। लेकिन यह वक्त परिवार की जरूरतों को समझने का है। तुम्हारे पापा की तबीयत बिगड़ती जा रही है। मैं चाहती हूँ कि तुम्हें पढ़ाऊँ, पर मजबूरन अभी नहीं कर सकती।" "तो मत कीजिए माँ! मैं खुद संभाल लूंगी। मुझे आपकी दया की कोई जरूरत नहीं," दीया ने आँसुओं से भरी आँखों के साथ ताने मारे थे।

उस रात दीया अपनी माँ से बिना बात किए कमरे में चली गई थी। उसके भीतर एक तूफान चल रहा था। माँ का हर तर्क उसे खुद के सपनों के साथ समझौता करने का दबाव लग रहा था। लेकिन जब रात गहरी हो चुकी थी, तो पानी लेने के लिए उठी दीया की नज़र माँ पर पड़ी। सिलाई मशीन की हल्की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी। माँ आँखों में थकान लिए, पैरों के पास फैली लंबी थान को नापकर काट रही थीं। माँ सिलाई के इस छोटे-से काम से घर के खर्चों में मदद करने की कोशिश करती थीं। वो कभी किसी की साड़ी में फॉल लगातीं, तो कभी कुर्ते की फिटिंग ठीक करतीं। लेकिन सिलाई के इस छोटे कारोबार से उन्हें मुश्किल से ही कुछ पैसे मिल पाते थे।

दिन बीतते गए, पर दीया का गुस्सा ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था। माँ अब भी रोज़ सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं। कपड़ों की थान उनके सामने फैली रहती, लेकिन दीया को लगता था कि माँ को उसके सपनों की कोई फिक्र ही नहीं है। "आपके लिए ये सिलाई ही सब कुछ है। आपको मेरी पढ़ाई की कोई परवाह नहीं," दीया ने एक दिन ताने कसते हुए कहा। माँ ने सिर झुकाकर बस सिलाई जारी रखी। उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।

जैसे-जैसे एडमिशन की आखिरी तारीख पास आ रही थी, दीया का दिल घबराने लगा था। उसे लगता था कि उसका सपना यहीं खत्म हो जाएगा। "पता नहीं माँ को मेरी चिंता है भी या नहीं। शायद उन्हें मेरी पढ़ाई से कोई मतलब ही नहीं," वह अपनी दोस्त से शिकायत कर रही थी। लेकिन माँ ने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की। बस रोज़ की तरह चुपचाप अपने काम में लगी रहतीं।

एडमिशन की आखिरी तारीख का दिन था। दीया पूरी तरह हताश हो चुकी थी। वह मान चुकी थी कि अब उसका कॉलेज जाने का सपना अधूरा रह जाएगा। "माँ, मैं कॉलेज नहीं जा पाऊंगी। अब सब खत्म हो गया है," उसने बुझे हुए स्वर में कहा। लेकिन माँ ने एक चौंकाने वाली बात कही, "तुम्हारा एडमिशन हो जाएगा बेटा। चलो तैयार हो जाओ। हम फीस भरने जा रहे हैं।" "कैसे?" दीया ने आश्चर्य से पूछा। माँ ने बस मुस्कराकर कहा, "बस भरोसा रखो।"

कॉलेज पहुँचकर माँ ने फीस काउंटर पर पूरे पैसे जमा कर दिए। दीया हैरान थी कि ये पैसे आए कहाँ से। रास्ते में उसने माँ से पूछ ही लिया, "माँ, ये पैसे कहाँ से आए?" माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "मैंने अपनी चूड़ियाँ और सोने के कंगन बेच दिए।" दीया के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आँखें भर आईं। "माँ, आपने ऐसा क्यों किया?" "तुम्हारा सपना मेरा सपना है बेटा," माँ ने प्यार से कहा। "मैं नहीं चाहती कि तुम्हें किसी चीज़ की कमी महसूस हो।"

दीया का दिल भर आया था। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद दीया ने पूरे उत्साह के साथ अपनी पढ़ाई शुरू कर दी। दीया के कॉलेज का पहला साल चल रहा था जब पापा की तबीयत एकाएक बिगड़ी। अस्पताल के ICU में लगी मशीनों की बीप-बीप के बीच माँ का हाथ पापा की ठंडी हथेली को थामे हुए था। दीया ने देखा कि जैसे सिलाई मशीन से माँ ने उसका सपना सजाया था, उसी की तरह अब वह पापा की ज़िंदगी की डोर सिलने की कोशिश कर रही थी। लेकिन सुबह के पहले पहर में, जब डॉक्टर ने सिर हिलाया, माँ के हाथ से पापा की उँगलियाँ छूट गईं।

पापा की मृत्यु के बाद माँ की स्थिति किसी खाली घोंसले की चिड़िया जैसी हो गई थी। जो इंसान पूरी जिंदगी दूसरों के लिए ही जिया हो, उसे जब किसी और के लिए कुछ करने की जरूरत न रहे तो खुद के लिए जीने का अर्थ कहाँ समझ आता है? दीया ने बहुत कोशिशें की थीं कि माँ खुद के लिए कुछ करने लगें- कभी नई सिलाई मशीन लेने की सलाह दी, तो कभी उनके पुराने शौक याद दिलाए। लेकिन माँ को मनाना आसान नहीं था। वो बस कहतीं, "अब कोई जरूरत नहीं बची बेटा। तुम अपना ध्यान रखो।"

समय बीतता गया, और दीया अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त होती गई। लेकिन माँ का वो चुपचाप जीवन जीना कभी-कभी उसे कचोटता था। आज जब दीया खुद एक माँ थी, तो उसे माँ की वो चुप्पी, वो त्याग, हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी करने की जिद बहुत गहरी समझ आने लगी थी। अचानक अवनि की आवाज़ ने उसे अतीत से वर्तमान में खींच लिया। "मम्मा!" उसने चिंतित स्वर में कहा, "मेरा फ्रॉक फट गया। मैं गिर गई थी।" दीया ने देखा कि अवनि का गुलाबी फ्रॉक एक तरफ से हल्का फट गया था। उसकी आँखों में चिंता की लहर दौड़ गई। "अरे बेटा, तुम ठीक तो हो?" "हाँ, मैं तो ठीक हूँ, पर फ्रॉक..." "कोई बात नहीं, मैं इसे ठीक कर दूंगी," उसने प्यार से कहा।

अलमारी से पुराना सिलाई बॉक्स निकालते हुए दीया को याद आया माँ इस सिलाई बॉक्स से कैसे न जाने कितने कपड़ों में जान डाल देती थीं... कैसे माँ कभी ब्लाउज की फिटिंग ठीक कर रही होतीं, तो कभी पापा के कुरते की फटी जेब सिल रही होतीं। हमेशा व्यस्त, हमेशा सबकी जरूरतें पूरी करती हुई। दीया ने धागा पिरोया और अवनि के फ्रॉक की फटी जगह को सिलने लगी। उसकी उंगलियां अब उसी लगन से काम कर रही थीं जैसे कभी माँ की उंगलियां करती थीं। हर टांके के साथ दीया को एक अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी-शायद वही खुशी जो माँ को दूसरों के लिए प्रयास करते हुए मिलती थी।

दीया ने फ्रॉक पर आखिरी टांका लगाया, धागा काटते हुए हल्के से मुस्कुराई। "क़तरा जब समंदर की गहराई नहीं देखता, तो उसे लगता है कि वो ही पूरा सच है। मुझे तब नहीं दिखा था कि माँ खुद भी उस समंदर का हिस्सा थीं। उनका त्याग, उनका संघर्ष- वो उनकी पहचान थी। मैं बस अपनी नज़र से उन्हें देखती रही, ये सोचे बिना कि उनके पास भी एक नज़र है, अपना एक सपना, अपना एक सच।" दीया ने अवनि के माथे को चूमा। आज उसे एहसास हुआ था कि कभी-कभी जिंदगी का समंदर देखने के लिए खुद को क़तरा मानने की जगह समंदर बनने की कोशिश करनी पड़ती है। माँ का जीवन भी समंदर था- जिसमें धैर्य, त्याग और प्रेम की लहरें हमेशा बहती रहीं। "शायद अब मैं देख पा रही हूँ। क़तरा समंदर को नहीं समझ पाता... पर जब नज़र बदल जाए, तो समंदर खुद तुम्हें अपना हिस्सा बना लेता है।"

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