लिबास गुड़िया का
शाम हो चुकी थी। सूरज क्षितिज पर ढल चुका था। रात का पहरा आने ही वाला था। धरती पर बैठे चकोर को अपनी चाहत के चाँद के दर्शन होने ही वाले थे। पर आज की रात में चकोर की चाहत के ठीक पन्द्रह दिन बाद अपने प्रेम के पूर्ण दर्शन होने को थे। पूर्णिमा की रात का अलग ही मिजाज होता है। उस रात का मिजाज जयपुर के बापू बाजार में भी दिख रहा था। सूर्य के ढलते ही गलियाँ लाइटों से जगमगा गई थीं। रात्रि की शांति को गाड़ियों और लोगों की चहल-पहल बड़ी आसानी से भंग कर रही थी। सौदों का बाजार चल ही रहा था। कहीं मिर्ची बीस की, कहीं तीस की। इसी लेन-देन की सौदाबाजी करने परी और उसकी माँ गंगा भी इस बाजार में आई थीं।
गंगा सौदेबाज़ी के बाज़ार में बड़ी पुरानी खिलाड़ी थी। कई सौदों की वो साक्षी रही थी। खुद की ज़िंदगी भी कई सौदों की शिकार थी। सुंदर, सुशील, सुलझी हुई गंगा समर्पण की मूर्ति थी। गंगा वास्तव में एक देवी से कम न थी। जब बात देवी की हो तो भक्तों के बिना देवी का गुणगान अधूरा होता है। भक्त भी गंगा रूपी देवी को काफी पसंद करते, जो हर रात इस दरबार में रात्रि का जागरण करने आ जाते। जैसे-जैसे रात ढल रही थी, गंगा को भी जागरण का ख्याल आ रहा था कि कहीं भक्त अपनी देवी से नाराज़ न हो जाएँ।
गंगा की परी भी जल्दी ही घर जाने को कह रही थी। परंतु चार साल की बच्ची को बाजार से जल्दी बाहर लाना कहाँ इतना आसान था। परी उम्र में चार साल की थी, पर समझदारी में किसी से कम न थी। उसे एक गुड़िया पसंद आ गई थी।
परी — “माँ... मुझे ये गुड़िया चाहिए, वो बड़ी वाली जिसने वो लाल साड़ी पहनी है।”
गंगा — “भैया, कितने की दी वो दुल्हन वाली गुड़िया?”
दुकानदार — “तीन सौ रुपये।”
गंगा — “तीन सौ रुपये भैया, ऐसा क्या है इसमें!”
गंगा ने बटुए की जेब टटोली और परी को देखा। परी भी समझ गई थी कि जब जिंदगी ने जुगनू रूपी प्रकाश से नवाज़ा हो, तो सूर्य की चाह करना ठीक नहीं।
परी — “माँ, भला इतनी बड़ी गुड़िया को मैं कहाँ ही रखूँगी?”
गंगा — “भैया, क्या कोई छोटी गुड़िया है?”
दुकानदार ने एक छोटी गुड़िया दिखाई। गंगा ने परी को छोटी दुल्हन वाली गुड़िया दिला दी और घर की ओर चल दी। वे दोनों चल ही रही थीं कि चंद्रमा भी अपने पूर्ण रूप से दर्शन दे चुका था। कई औरतें लाल-लाल साड़ी पहने चंद्रमा को अर्घ्य देने आ गई थीं। परी भी उन सभी औरतों को देखकर अपने मन में सवालों का कौतूहल बुनती गई और गंगा से पूछने लगी — “माँ, आप ये चंदा मामा को खाना क्यों नहीं खिलाती हो? आप तो रोज़ रात लाल चटक साड़ी पहनती हो, परंतु इन सब की तरह आप क्यों नहीं करतीं?”
गंगा के मन में तूफान उठ चुका था। उसके सामने मानो आज उसके वजूद का सवाल था। ये सवाल उसने भी कई बार अपने आप से किया था, किंतु जवाब उसे कभी न मिला। यूँ तो ये सुहागन औरतें कुछ पल चाँद का दीदार करतीं और जीवन भर सौभाग्य प्राप्त कर लेतीं, परंतु वह पूरी रात इस चाँद का दीदार करती, फिर भी यह सौभाग्य उसे प्राप्त न हो सकता था।
गंगा इन्हीं ख्यालों में डूबी हुई थी कि उसकी नजर अपनी चाँद रूपी बेटी के मुखड़े पर गई, जो बेसब्री से इस सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रही थी।
गंगा ने जवाब दिया — “बेटा, वो ईश्वर दादा मुझसे बहुत प्रेम करते हैं, इसलिए उन्होंने मुझे भूखे-प्यासे रहकर ये सब करने से मना किया है। और ये सब कार्य शादीशुदा औरतें करती हैं, जो हमारी नियति में नहीं लिखा।”
तभी परी का ध्यान उस दुल्हन रूपी गुड़िया पर चला गया और वह बोलने लगी — “माँ, मुझे गुड़िया काफी पसंद आई। मैं जब बड़ी हो जाऊँगी तो अपनी शादी में वैसी ड्रेस पहनूँगी। ईश्वर दादा तब तक हमें पैसे भी दे देंगे। कल से तुम रोज मेरे चॉकलेट वाले पैसे बचाकर रख देना। मैं उन पैसों से वो लाल लहंगा लाऊँगी। कितनी सुंदर लगूँगी न मैं माँ! माँ, प्रिया मौसी और सोनू को भी बुलाएँगे।”
परी की बात सुनकर गंगा हैरान रह गई। उसने मानो ऐसी बात सुन ली थी, जो शायद कभी सच न हो सकती थी। इसलिए उसने अपनी बेटी को झूठा आश्वासन देने के बजाय शांत रहना चुना। बाहर गाड़ियों के हॉर्न के शोर से ज्यादा गंगा के शांत मन में शोर का तूफान उठ रहा था कि क्यों नियति ने उसके जीवन रूपी कैनवास में काली स्याही से पूर्ण तूलिका से काल की काया का चित्र बना दिया था।
इन सब विचारों के चलते-चलते वह कब घर पहुँच गई, उसे पता ही न चला। गंगा ने जल्दी से खाना बनाया और परी को उसकी नई गुड़िया के साथ सुलाने के लिए लोरी गाने लगी। जब-जब गंगा लोरी गाती, तो ऐसा लगता मानो स्वयं मीरा गा रही हो। गले को सरस्वती माता का वरदान था, परंतु सती का श्राप था, जिसके कारण उसके जीवन रूपी किताब से गृहस्थी शब्द पूर्ण रूप से हटा हुआ था।
गंगा लोरी गा रही थी, तभी परी ने एक डरावना सपना देखा और उससे चिपककर रोने लगी।
परी — “माँ, आज काम पर मत जाओ, मुझे डर लग रहा है।”
माँ — “नहीं बेटा, वरना कल हम खाएँगे क्या? डरने की कोई बात नहीं है, मैं बस सामने वाली हवेली में हूँ, यहीं हूँ।”
परी ने गंगा को लाल साड़ी में, होठों पर लाली और गले में मोतियों वाला हार पहने देखा, और वह समझ चुकी थी कि उसकी इच्छा गलत है।
परी — “माँ, तुम काफी सुंदर लग रही हो। मैं भी अपनी शादी में ऐसे ही सजूँगी, तुमसे सुंदर।”
गंगा से रुका नहीं गया। वह चिल्ला उठी — “नहीं, तुम कभी ऐसे नहीं सजोगी!”
यह कहते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने परी को अपने गले से लगा लिया और परी को नींद आ गई। गंगा परी को सुलाकर अपने कर्म रूपी मंदिर में चली गई जहाँ हर रात जगराता चलता रहता।
गंगा की कर्म भूमि का माहौल बहुत अलग था। वह पूरी रात मेहनत करती तब जाकर दिन की रोटी का खर्चा निकाल पाती। पर नौकरी स्थायी थी और पुश्तैनी थी। गंगा की माँ के बाद उसी ने इस विरासत को संभाला था। बस इस दफ़्तर में सेवानिवृत्ति का प्रावधान बड़ी जल्दी उम्र में था। चालीस की उम्र ढलते ही खुद इंसान अपने पद को अपने वंशज को सौंप देता।
दफ़्तर पूर्ण रूप से लाल पीली नीली लाइटों से चमक रहा होता था जहाँ कई बड़े-बड़े जीवन के आस रूपी झूमर झूल रहे थे। हर कर्मचारी को अपना-अपना कमरा मिला हुआ था जहाँ वो अपने ग्राहकों को संभालती। गंगा के लिए भी आज ग्राहक काफी इंतज़ार कर रहे थे और शहर के उच्च पद पर पदोन्नत दरोगा साहब ने सभी ग्राहकों से ज्यादा दाम की बोली लगाई थी गंगा देवी के लिए। मानो दरोगा साहब अपने पाप धोने के लिए गंगा के पास आए थे। और दरोगा साहब ने अपने पाप धो लिए, पर क्या कभी गंगा से पूछा गया है कि क्यों वो उन पापों के मैल को समाना चाहती है या नहीं? गंगा बिल्कुल प्रसन्न न थी पर अपने वजूद के लिबास को छोड़ना उसके हाथ में न था, इसलिए वो सब शांति से अपनी नियति के तोहफ़े में मिले विभिन्न लोगों की नीयत को अपनाती रहती। दरोगा साहब अपने पाप धोकर बिस्तर पर बगल में सो गए थे। परंतु गंगा की आँखों में नींद कहाँ थी।
तभी गंगा की नज़र खिड़की से बाहर उस पूर्ण चाँद पर गई, जो उसके जीवन के हर हिस्से का मूक साक्षी था जिसने गंगा की आँखों की अश्रु-धारा को सूखते हुए देखा था। गंगा को परी की दुल्हन वाली गुड़िया याद आ गई थी। कितनी अभागिन माँ थी वो जिसके लिए अपनी बेटी के शादी के सपनों को देखना भी सही न था। उसे समझ न आ रहा था कि समाज दुल्हन के लाल-लिबास को इतनी खुशी से अपनाता है, परंतु उसके लाल-लिबास पर दुनिया शर्म का दुपट्टा ओढ़ा देती है।
इन्हीं विचारों में डूबी गंगा को कब नींद आ गई उसे पता ही न चला। गंगा का मन बेचैन था। उसने कल वाले हादसे की बात अपनी हमदर्द दोस्त, सखी प्रिया को बता दी जिसका कक्ष उस दफ़्तर में उसके कक्ष के सामने ही था। प्रिया भी हैरान रह गई।
प्रिया— "गंगा इसमें परी की क्या गलती। उसे कहाँ पता कि उसकी किताब तो पहले ही लिख दी गई जब उसने तेरी कोख से जन्म लिया। आज से पन्द्रह साल बाद उसे भी इसी बाज़ार से वचन बाँधने हैं। हमारे जीवन रूपी गुड़िया को लिबास ईश्वर ने पहले से पहना दिया है। गंगा परी को भी इस लिबास को अपनाना ही होगा। तू उसकी झूठी उम्मीदों को हवा न दे। उसे यह शादी-ब्याह जैसे विषयों से दूर रख। सजने-सँवरने की सीख दे। कल वो सोनू के साथ बगल वाली गली के बच्चों के साथ किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी। उस पगली को क्या ही पता हमारी पढ़ाई सिर्फ हिसाब-किताब तक सीमित है।"
गंगा ने प्रिया की बात सुनी तो आज पहली बार उसने जीवन में आवाज़ उठाने की कोशिश की।
गंगा— "प्रिया हमने लाचारी में लिबास पहना है पर ज़रूरी नहीं परी ये लिबास पहने। कब से ये पुश्तैनी रीत चली आएगी, किसी को तोड़नी होगी। मेरी परी ये लाल रूपी पीड़ा से परिपूर्ण रक्त से भरा लिबास नहीं पहनेगी। मेरी परी रूपी गुड़िया को शादी का लाल जोड़े का लिबास मिलेगा। इसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ। ज़रूरी नहीं हर कपड़ा हमेशा पहना जाए, उसे कभी उतारना भी पड़ता है ताकि वह धुल सके। मेरी परी की नियति का यह दाग मैं धोकर रहूँगी। और परी दूसरी गंगा नहीं बनेगी।"
प्रिया— "कौन करेगा इस मोहल्ले की लड़की से ब्याह?"
गंगा— "इस मोहल्ले की लड़की से तो कोई नहीं करेगा परंतु एक शिक्षित और आज़ाद लड़की के लिए ज़रूर कुछ होगा।"
प्रिया— "पैसे कहाँ से लाओगी?"
गंगा— "अपनी बेटी के लिए दिन-रात मेहनत करूँगी, पर उसे यहाँ नहीं आने दूँगी!"
गंगा के जीवन को एक नया मकसद मिल गया था। उसने पैसे-पैसे जोड़कर परी की पढ़ाई शुरू करवा दी। मोहल्ले में काफी हंगामा हुआ तो उसने परी को पढ़ने के लिए सीकर भेज दिया, जहाँ उसकी पहचान सिर्फ एक छात्रा थी। उसके मोहल्ले का वहाँ कहीं ज़िक्र न था। परी भी काफी मेहनत से पढ़ाई करती। उसे बचपन से पढ़ने का शौक था। अब उस शौक के साथ उसके सामने उसकी माँ का सपना और त्याग, तप, तपिश और मेहनत थी। गंगा ने अपने कलेजे को मजबूत किया था। कभी मिलने का मन होता तो खुद उसके पास चली जाती, परंतु परी को कभी वापस न बुलाया।
ऐसे करते-करते बीस वर्ष बीत गए और कब मेहनत करते-करते जुगनू ने सूर्य के प्रकाश सा अलौकिक चमक पा ली, पता ही न चला। परी एक शिक्षिका बन गई थी। आज वह बीस वर्ष बाद फिर अपनी माँ से मिलने आई थी। सभी लोगों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। गंगा आज मानो काफी खुश थी। परी एक लड़के के साथ आई थी जिसे उसने अपने जीवन साथी के रूप में चुना था। वे दोनों गंगा का आशीर्वाद लेने आए थे।
गंगा हैरान थी, उसके जीवन में कभी इतनी खुशी ने दस्तक न दी थी। गंगा ने शादी की स्वीकृति दे दी। एक महीने बाद वहाँ अरमानों की डोली उठी और परी की विदाई हुई। उस इलाके में चार कंधों पर जनाजे तो कई बार उठे थे, परंतु डोली पहली बार चढ़ी थी।
गंगा का सपना पूरा हुआ। प्रिया की आँखों में आँसू थे। तभी गंगा की नज़र उस गुड़िया पर गई और वो उसे कलेजे से लगाकर रोने लगी। मानो गंगा के पवित्र आँसुओं ने परी के लाल जोड़े के लिबास को पवित्र कर एक शादी के जोड़े में बदल दिया था, जिसने उसे किस्मत के विपरीत जाकर पाया था।