सफलता और अहंकार
आसमान और ज़मीन
के बीच की रेखा की
एक खास विशेषता है
ज़मीन पर बैठकर वह
जितनी महीन दिखती है
आसमान से उतनी ही मोटी !
यह बात मुझे ज़रा
देर से पता चली
क्योंकि...
मेरे पैर ज़मीन से
छूट नहीं पा रहे थे
हालाँकि पक्षियों को मैं
अक्सर निहारा करता था
ये सोचकर ... कि शायद
उनके पंखों की हवा
मेरे पैरों से धूल के कण हटाकर
मुझे स्वतंत्र कर दे
ठीक वैसे ही जैसे
धूप स्वतंत्र कर देती है पसीने को
देह से !
वे उड़ानें
वह धूल तो न हटा सकीं
लेकिन मुझे आँधियों में
अड़कर पंख फ़ैलाना सिखा गईं...
धूल अंततः हट गई
फिर एक
विचित्र अनुभव हुआ मुझे
अचानक मिट्टी ने
मेरे पैरों को
साधने की क्षमता
खो दी !
और उसी समय
मेरे मन, मस्तिष्क, और हृदय
तीनों का औसत घनत्व
समान रूप से गिरने लगा...
जिसके कारण
मैं इतना हल्का हो गया
कि हवा मुझे उड़ा कर
ऊपर आकाश की ओर
ले जाने लगी
और तभी... हाँ तभी
मैंने देखा उस रेखा का
एक नया आयाम !
वह रेखा एक
द्विआयामी सतह थी
एक अपारदर्शी सतह
इसीलिए जितना ऊपर
हवा ले जाती
मुझे, वह रेखा
उतनी ही मोटी दिखने लगती
और ज़मीन उतनी ही ढकती जाती
मेरी दृष्टि से
अभी मुझे
ज़मीन दिख रही है
और उसके गुरुत्वाकर्षण
से स्याही
कलम से नीचे,
कागज़ पर उतर रही है
और मैं
यह विचित्र अनुभव
साझा कर पा रहा हूँ
अगर तुम्हें भी
अपने पैरों की धूल
चुभती हो
तो निहार लो मुझे,
सराह लो मेरे पंखों को
इससे पहले
कि वह रेखा पूरी ज़मीन को
ढक ले और
तुम अदृश्य हो जाओ!