व्यर्थ के गीत गाने का क्या फ़ायदा
व्यर्थ के गीत गाने का क्या फ़ायदा
मन की कोई चुभन,
दिल में जलती अगन,
सच का बेबाकपन जिसमें ज़ाहिर न हो
ऐसी बातें बताने का क्या फ़ायदा
व्यर्थ के गीत गाने का क्या फ़ायदा
भ्रष्ट सम्पूर्ण सत्ता, परिवर्त्य है
मीडिया भी खिलौना बनी दंभ का
प्रश्न सरकार से पूछती ही नहीं
भार घटता दिखे चौथे स्तंभ का
वो विदेशों का रण,
उन अमीरों का धन,
किसका किससे लगन हो रहा आजकल
आँकड़े ये गिनाने का क्या फ़ायदा
व्यर्थ के गीत गाने का क्या फ़ायदा
शब्द ऐसे लिखो हिल उठें कुर्सियाँ
डगमगाने लगें क्रूर शाहों के स्वर
इन क्षणिक तालियों से ही न खुश रहो
ऐसी कविता लिखो कि चुभे उम्र भर
रोज़ घटती हुई रोज़गारी लिखो
बिक रही अरावली की पहाड़ी लिखो
नौजवानों से सत्ता का भिड़ना लिखो
दिनदहाड़े नए पुल का गिरना लिखो
धर्म की आड़ में होती हिंसा लिखो
अब भी कटता मणिपुर में इंसाँ लिखो
तुम लिखो, तुम लिखो, तुम लिखो, कुछ लिखो
तुम लिखो, कुछ लिखो, तुम लिखो, कुछ लिखो
जल है दूषित लिखो, धुंधले आकाश पर
लिख सको तो लिखो अंधविश्वास पर
प्रेम और द्वंद्व पर तो बहुत लेख हैं
तुम लिखो आज लिखने के उपहास पर
भीड़ आंदोलनों में नहीं दिख रही
वीरता की ये घटती तथा तुम लिखो
पितृसत्ता के परदे के पीछे खड़ीं
स्त्रियों के हरण की व्यथा तुम लिखो
शोषितों का दमन,
न्याय का वो जतन,
मूक था जो कथन वो ही लिख न सके
फिर ये स्याही खपाने का क्या फ़ायदा
व्यर्थ के गीत गाने का क्या फ़ायदा