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कविता

ऐ भारत के अविचल लोगों

सौभाग्य पाण्डेय
Apr 3, 20263 min read

ऐ भारत के अविचल लोगों आज ये मेरी हार सुनो,
सुन चुके बहुत से प्रेम-गीत, आज मेरी ललकार सुनो।
आँखों में अश्क प्रवाह लिए लिखता हूँ कलम उठाता हूँ,
है बात ज़ुबाँ तक आई, तो कागज़ तक भी पहुँचाता हूँ।

हुई भोर, अख़बार खोल, बैठा मैं ओढ़, बादल काले,
कहीं मान लुटा, कहीं देश बँटा, खबरें जो मन निचोड़ डालें।
सोचा घनघोर घटा छाई, कुछ बात सुहानी करता हूँ,
आँख मूँद कर, पृष्ठ पलटता, खबरें अफ़सानी पढ़ता हूँ।

अगले ही पल, ये सोच विकल, हो भर आया ये अंतर्मन,
पृष्ठ मात्र पलट देना, खुशियों की रवानी कैसे है?
सच ही शिव है, शिव ही सुंदर, सुंदरता तो सच में है,
तो सच से मुख मोड़ लेना, बात सुहानी कैसे है?

दिल में ये बात रूहानी लेकर, लिखता हूँ, कलम उठाता हूँ,
है बात ज़ुबाँ तक आई, तो कागज़ तक भी पहुँचाता हूँ।

कल सपने में आए थे वो, जिन्ने हमको वरदान दिया,
लड़कर आज़ाद किया भारत, और हमको जीवनदान दिया।
बोले किस हाल में छोड़ा था, और कैसी हालत कर डाली,
क्या यही देखने की खातिर हमने तुमको आज़ाद किया?

चाणक्य शिखा को खोल खड़े, अति क्रोधित हो धिक्कार गए,
खालिस्तानी नारे देखे तो गुरु नानक भी हार गए।
सम्मान धर्म का घटते देख, विवेकानंद क्षीण हुए,
लोगों को जाति में बंटते देख, वेदव्यास भी खिन्न हुए।

ये बात उन्होंने बोली तुमसे, मैं तो बस दोहराता हूँ,
है बात ज़ुबाँ तक आई, तो कागज़ तक भी पहुँचाता हूँ।

लौहपुरुष सरदार नहीं सुन सके तोड़ने के नारे,
नेताजी देख अचंभित थे ये भ्रष्ट राजनेता सारे।
भारती सेना पर उनके ही, लोगों ने पथराव किया,
ये देख शहीद-ए-आज़म भी गमगीन हुए, हिम्मत हारे।

जिस भारत ने पुरुषोत्तम राघव को गोद उठाया है,
जिस भारत में कान्हा ने गीता का ज्ञान सुनाया है।
जिस भारत की पुण्य धरा पर सिख, जैन, और बुद्ध हुए,
स्त्री का मान बचाने को महाभारती युद्ध हुए।
वो भारत जिसने जाने कितने सिकंदरों को मोड़ दिया,
सोलह बार जीतकर भी, दुश्मन को ज़िंदा छोड़ दिया।

ऐसे आदर्श महान हुए, फिर भी भारत शर्मिंदा है,
ऐ भारत के अविचल लोगों, क्या शर्म तुम्हारी ज़िंदा है?
भूले वो धर्म सनातन, जिसने मानवता का पाठ दिया,
छत्रपति के भारत को, मज़हब की खातिर बाँट दिया।

क्यों आज भ्रष्ट है हर कोई, पैसा ही पैसा भाता है,
क्यों आज देश को छोड़, युवा परदेश की रोटी खाता है?
क्या राष्ट्र गैर की भूमि है, जो सड़कों पर कूड़ा फेंको?
क्या विश्व एक परिवार नहीं, जो बस स्वयं का हित देखो?
जिस बहन का मान हरा तुमने, क्या वो हम सबकी बहन नहीं?
पर-स्त्री पर है कुदृष्टि तो, स्व-स्त्री पर क्यों सहन नहीं?

ऐ कर्ण-भूमि पर जनने वाले, दान में कितने कवच दिए?
गरीब देश को कहने वाले, बोलो कितने सत्कार किए?
सत्कार किए भी तो उसपर अहंकार कर बैठ गए,
ज़रा सी शोहरत भी आई तो कमज़ोरों पर ऐंठ गए।

क्या ये भारत की पुण्य भूमि, क्या यही मूल्य हैं भारत के?
है किसकी ज़िम्मेदारी कि भारत की आन नहीं जाए?
महज़ सरकार का है भारत? या तुम्हारा भी है मेरा भी?
निश्चित हमको करना है, कि यह अभिमान नहीं जाए।
हमारी खातिर खड़े हुए, जो लड़े, आज़ादी हमको दी,
अब हमको तय करना है, उनका सम्मान नहीं जाए।

ऐ भारत के युवा जगो, सच बात पुनः दोहराता हूँ,
आँखों में आशा लेकर लिखता हूँ कलम उठाता हूँ।
ऐ भारत के अविचल लोगों, आज ये मेरी हार सुनो,
सुन चुके बहुत से प्रेम-गीत, आज मेरी ललकार सुनो।
आँखों में अश्क प्रवाह लिए लिखता हूँ कलम उठाता हूँ,
है बात ज़ुबाँ तक आई, तो कागज़ तक भी पहुँचाता हूँ।

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