तुम सौरभ पहली बारिश की
तुम सौरभ पहली बारिश की,
तुम अधूरी-पूरी ख़्वाहिश भी,
तुम्हें पाएँ तो मुकम्मल भी,
तुम्हें पाने की है साज़िश भी।
काँटों भरे रेगिस्तान में तुम पानी की ख़्वाहिश हो,
खुशियों के मौसम की कोई पहली तारीख हो,
महक उठता है ज़मीं के टुकड़े सा जिस्म मेरा,
असल में तुम तुम नहीं, तुम तो पहली बारिश हो!
मैं तितर-बितर मन के तीतर सा,
तू चाँद की चाहत का चकोर है,
मैं इधर-उधर दमकता दीपक सा,
तू दीपक से भी उजला कोई भोर है।
काश वो बादलों से घिरा चाँद भी कभी वाक़िफ़ हो,
कि तुम खुदा की नज़ाकत से बुनी, कोई साज़िश हो,
नाच उठता है मुझसा मोर तुम्हारे नाद से,
सच कहूँ तो, तुम तुम नहीं, तुम तो पहली बारिश हो!
उमड़े कारे बरखा जीवन से आब में,
खुलके नाचे मुझ सा मोर तेरे ताल पे,
तूफ़ाँ मज़हब सा तुझ को क्यूँ घबरावे रे?
खारा दरिया,
पहली बारिश की ये बात समझ ना पावे रे!
लगे नज़र काले बादलों सी, तो तुम मेरा तावीज़ हो,
दबा बीज नहीं, फूटे अंकुर सा इश्क़ तेरा ज़ाहिर हो,
काफ़ी बरसती हो मुझ पर बारिश सी,
असल में तुम तुम नहीं, तुम तो पहली बारिश हो!