फूल और पत्थर
स
संजय खराबीज बोने से फूल उगते हैं
पत्थर बोने से पहाड़ नहीं उगते।
गर फूल फेंक कर मारा जाए तो इज़हार होता है,
गर वो ज़िम्मा पत्थर ले ले, तो दंगा तैयार होता है।
शोक मनाया जाता है फूल कफ़न में सजाकर,
वही शोक बीते दिन सा दफ़न हो जाता है पत्थरों से!
बेशक काँटे हैं, लेकिन पत्थरों से बदनाम नहीं हैं
तोड़ लिए जाते हैं, लेकिन पैरों से ठुकराए नहीं जाते।
लेकिन
जब छैनी की मार पड़ती है तो टूटते नहीं, निखर के आते हैं पत्थर
महज़ चटकाने से टूट जाते हैं वो नाज़ुक फूल
पत्थर मूर्तियाँ बनकर अड़े रहते हैं
वो ही नाज़ुक फूल बिखर जाते हैं उन मूर्तियों पर।
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