तुम्हारी ही हालत संभल सी गई है
उ
उत्कर्ष केशरवानीतुम्हारी ही हालत संभल-सी गई है,
अभी तक वतन में अज़िय्यत वही है।
ये ता'लीम के पर्चे कब के सजे हैं,
अभी भी ख़मोशी मुसलसल बनी है।
कहाँ से तसल्ली यूँ तुमको मिलेगी,
तुम्हें तो सभी की तमन्ना रही है।
तकल्लुफ़ में उलफ़त न ढूँढा करो तुम,
तुम्हें इस जहाँ की ख़बर ही नहीं है।
ये कैसा नया इल्म मुझे है दिया जो,
मुझे अब किसी से मोहब्बत नहीं है।
कहीं इसमें कुछ उसमें ख़ामी दिखी है,
यहाँ कोई इंसाँ मुकम्मल नहीं है।
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