शरशय्या
शरशय्या पर सन्नाटों संग, साँसों की सरगम बहती है,
न सवाल अब मैं करता हूँ, न ख्वाहिश ख़ुद कुछ कहती है।
बिखरे ख़्वाबों की परछाईं, तकिए से लिपटी रहती है,
भीतर कोई ख़ामोशी है, साँझ-सहर मुझसे कहती है।
मन के भीतर मन से लड़ते, अपने मन के मारे हम,
अपनी उलझन की अनबन में, ख़ुद से ही हैं हारे हम।
शब-ओ-रोज़ हंगामों में सब, रफ़्ता-रफ़्ता बिखर रहा है,
सदियों-सदियों वही तमाशा, सुकूँ समाँ से बिछड़ रहा है।
रिमझिम-रिमझिम वर्षा होती, ग़म के मेघा छा जाते हैं,
उमड़-उमड़ कर शय्या पर ये, शर की नाव डुबा जाते हैं।
मन के भीतर की चौसर के,
मन के भीतर की चौसर के दाँवों के हैं मारे हम।
अपनी उलझन की अनबन में, ख़ुद से ही हैं हारे हम।
जग की चलती भीड़-भाड़ में, पथ वीरान हो जाते हैं।
जग जाहिर जीने में अक्सर, शीशे टूट ही जाते हैं।
किसमें ख़ुद को देखूँ अब,
किसमें ख़ुद को देखूँ जब हम कुछ के कुछ बन जाते हैं।
भीष्मतुल्य हम शरशय्या पर, मौन मृत्यु को पाते हैं।
मन के भीतर सच से लड़ते, मिथ्या के हैं मारे हम।
अपने भीतर की अनबन में, ख़ुद से ही हैं हारे हम।
मन के बाज़ारी प्रांगण में, गुंचे-फूल मुरझाते हैं।
उस बंजर-बेजान ज़मीं पर, घर कब तक टिक पाते हैं।
रोम-रोम ये रेत के जैसा, ज़र्रा-ज़र्रा बिखर रहा है।
न जाने क्यों घर भी मेरा, बेघर मुझमें मर रहा हैं।
ख़ुद के भीतर जीते-मरते असमंजस के मारे हम ।
अपनी उलझन की अनबन में, ख़ुद से ही हैं हारे हम।
किसके भीतर झाँका किसने, जाने किसका साया है।
मन बोझों का भार सकल, अब भीष्म यहाँ तक आया है।
हर मंडल में ध्रुव बनकर ये,
हर मंडल में ध्रुव बनकर नर-नर के मन में छाया है।
दुविधा, संशय, छल में फँसकर, ख़ुद पर प्रश्न उठाया है।
मन के भीतर मन से लड़ते, भीष्मतुल्य हैं मारे हम।
अपनी नज़रों से गिरकर ही, खुद से हर दिन हारे हम।
शरशय्या पर सन्नाटों संग, साँसों की सरगम बहती है,
न सवाल अब मैं करता हूँ, न ख्वाहिश अब कुछ कहती है।