शामों में अब ढल रही ज़िंदगी
सोच का दायरा तम में सिमटा हुआ
बंद कमरे है पल रही ज़िंदगी
थी प्रकाशित सुबह की तरह जो कभी
वो है शामों में अब ढल रही ज़िंदगी
साँस लेने में भी हृदय घबराता है
रोशनी में भी साया नज़र आता है
ज़िंदगी भर कहीं जो न फिसला कभी
उसके ही हाथों से फिसल रही ज़िंदगी
कुछ हैं राहें कठिन, कुछ हवा सर्द है
पर सता जो रहा भीतरी दर्द है
धड़कनों में पली, आँसुओं से जली
धीमी सी आँच पर जल रही ज़िंदगी
अब न माँ यह कहे खाना कब खाएगा
न पिता ने कहा कब तू घर आएगा
फ़र्क क्या जीने मरने का है रह गया
चंद साँसों से है टल रही ज़िंदगी
काम में अटकलें, छल कपट प्यार में
मन की सारी व्यथा दिखती संसार में
सब फिज़ा बाघ में है घुली आग में
कोरे कागज़ सी है जल रही ज़िंदगी
मौत से आदमी डरता बेकार में
आज तक न मरा कोई इक बार में
कतरा कतरा बने बूंद आशाओं की
आँख के आँसू बन निकल रही ज़िंदगी
पर है दिल में रखा इक घड़ा आस का
नीर जिसमें ज़रा सा है विश्वास का
ऐसे नीरों से मिलके बनी इक नदी
जिसकी धारा पे है चल रही ज़िंदगी