मुख्य सामग्री पर जाएं (Skip to main content)
नज़्म

दस चेहरे

आशुतोष आनंद मेहता
Apr 4, 20261 min read

इक शाम फ़रेबों आऊँगा, शीशा-साज़ी करने आऊँगा
मैं सच कहता हूँ मुफ़्त में सबको आईना बँटवाऊँगा

हर शख़्स के अंदर दस चेहरे, इक चेहरा जो मतवाला है
मैं मतवाले को ज़ाम पीला जब 'अक्स उसका दिखलाऊँगा

तब पूछूँगा वो कौन हैं नौ, जो झूठे लाले देते हैं
जो खाली प्याले देते हैं, कभी टूटे तालें देते हैं

मैं पहले टूटे तालों से हर खाली प्याले तोडूँगा
उर सच्चाई का लेप लगा हर झूठे लाले खोलूँगा

फिर ग़म-वहशत हथियार बना, सब आईने तोड़ आऊँगा
बस इक टुकड़े को हाथ में ले, हर नौ को क़त्ल ते जाऊँगा

कुई दरवाज़े पे दस्तक दे, तो नाम मिरा बतलाना तुम
मैं मुज़रिम हूँ पर दस चेहरों में, हथकड़ियाँ लगवाना तुम

दरख़्वास्त मिरी मन जाए तो,मैं अपना वकील बनूँगा ख़ुद
नौ चेहरे कठघड़े में खड़ा करके, दलीलें उनकी सुनूँगा ख़ुद

दूँगा उनको काला पानी, या फाँसी देकर जाऊँगा
हर शख़्स का करके इक चेहरा, मैं फ़ना जहाँ से हो जाऊँगा

Share

Tags

nazmurduurdu shayariurdu nazmurdu poetrypoemhindi kavita