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कविता

चाँद नहीं करता कुछ रोशन

बुरहानुद्दीन मर्चेंट 'बुरहान'
Apr 4, 20262 min read

मैं नहीं कह सकता चाँद तुम्हें,
ना तुम्हें सूरज कह सकता हूँ,
तुम चाँद नहीं हो, सूरज भी नहीं हो।

कल की बात रही होगी,
जब मैं अकेला चाँद के नीचे बैठके नग़मे सुनता था।
झूठ ये सब दुनिया कहती है, चाँद नहीं करता कुछ रोशन,
चाँद तो करता है अंधेरा, अकेलेपन का अंधेरा।
रात अकेलेपन का मंदिर,
चाँद अकेलेपन का भगवन;
चाँद नहीं करता कुछ रोशन।

हाँ, सूरज रोशन करता है,
दिन में यूँ कह सकते हैं कि भीड़ ज़रा मिल जाती है।
पर भीड़ से क्या मतलब हमको है?
भीड़ तो सब बाहर रहती है, अंदर रहती है तन्हाई।
चौंधिया जाती है आँख फ़क़त,
पर दिल अंधेर नगर रहता है।
सूरज के तीव्र उजाले में,
दिल का अंधेरा बढ़ता है;
तो सूरज भी करता है अंधेरा,
सूरज भी नहीं करता कुछ रोशन।

तुम ऐसा चाँद नहीं हो सकती,
सूरज भी नहीं हो सकती ऐसा।

तुम इक जुगनू हो,
इक छोटा सा जुगनू।
मैं भूल गया हूँ अंधेरों को,
कैसे दिखते थे अंधेरे।
मैं भूल गया हूँ अकेलेपन को;
जब मन दिल के अंधेरे कोने में जाने को होता है,
तब-तब आस के लिए रोशनी इक जुगनू चला आता है।
वो जुगनू तुम हो।
तुम शायद दुनिया के अंधेरों को तो जान नहीं सकते,
पर तुम...
तुम मेरे दिल के अंधियारों से यार बख़ूबी वाक़िफ़ हो।
तुम नहीं रोशन कर सकते जग को,
पर मेरे दिल की गहराई में,
आता है तुमको
उजाला करना।

तुम इक जुगनू हो,
इक छोटा सा जुगनू।
दुनिया को रोशन नहीं कर सकते,
पर मेरे दिल को कर सकते हो,
क्योंकि
तुम मेरे जुगनू हो।

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