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ग़ज़ल

न ख़लिश कोई न तपिश कोई

बुरहानुद्दीन मर्चेंट 'बुरहान'
Apr 4, 20261 min read

न ख़लिश कोई न तपिश कोई ये हैं ज़िंदगी मुझे मार दे
मैं बरस के ख़ुश तो नहीं हूँ मुझको तू बर्क़ दे या उतार दे

मिरा नाम ले मुझे ख़्वाब दे जो न आब दे तो सराब दे
मिरे चाँद तू जो न आ सके मुझे चाँदनी तो उधार दे

वो है शबनमी मगर ऐ सबा उसे गुल की झूठी शराब दे
उसे ज़ौक़-ए-ज़हर-ए-बक़ा बता उसे ज़िंदगी का ख़ुमार दे

ये नज़ारा-ए-दिल-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ मेरे आँसुओं को ज़रा दिखा
कि कहे न शाद कोई मुझे मेरे ग़म को कुछ तो वक़ार दे

मेरी क़ुर्बते मेरी फ़ुर्क़ते ये मुहब्बतें ये अदावतें
पस-ए-लब है क़ैद ये दिल मेरा ऐ मेरी ग़ज़ल तू गुहार दे

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