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ग़ज़ल

दूर आफ़्ताब सैराब है तुझसे

बुरहानुद्दीन मर्चेंट 'बुरहान'
Apr 3, 20261 min read

दूर आफ़्ताब सैराब है तुझसे फिर क्यों न जलेंगे हम
ऐ समंदर साहिल होकर भी क्या प्यासे ही रहेंगे हम

जान चुके हम ख़ुल्द जहन्नम दुनिया अर्श सितारे सब
जान-ए-जानाँ तुझको जाने कितना जान सकेंगे हम

चेहरा गहरा सहरा सा पर अंदर मेरे समंदर है
ख़ाक हटाओ तैर के आओ डूब गए तो मिलेंगे हम

शमशीर तीर ख़ंजर से ज़ख़्मी कर दो मेरे जनाज़े को
यारो उसने कहा था सुर्ख़ लिबास में ख़ूब जचेंगे हम

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