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कविता

सबसे बड़ा झूठ

प्रतीक रंजन दफ्तुआर
Apr 4, 20263 min read

झूठ अक्सर सच का विरोधी नहीं होता
कई बार वह उसका पड़ोसी होता है,
इतना पास, इतना समान,
कि दोनों को अलग करने में
सदियों की आँखें भी धोखा खा जाती हैं
वह किसी एक दिशा से भी नहीं आता
कई रास्तों, कई आवाज़ों, कई रूपों में
वह धीरे-धीरे हमारी दुनिया में उतरता है

इतिहास ने भी अपने हिस्से के झूठ सँजोए हैं
युद्धों के जयघोष इतने ऊँचे दर्ज हुए
कि पराजितों की चीख़ें
पन्नों की तहों में दबकर
अपनी प्रतिध्वनि तक न बची
और समय ने बार-बार
इन अधूरी आवाज़ों को
हाशिये के छोटे अक्षरों में बदलकर
सभ्यताओं की रीढ़ में गूँथ दिया
मानो यही सत्य रहा हो, हमेशा से

धर्म में भी कितने झूठ पनपे
जहाँ ऊँचाई और नीचाई
माँ की कोख से बाँट दी गई
मानो आत्मा का आकार
खून की किसी लकीर से तय होता हो
जहाँ स्त्री को देवी घोषित कर
उससे मनुष्य होने का अधिकार छीन लिया गया;
और उनकी आवाज़ें
मर्यादा की परछाइयों में बाँध दी गईं
इतनी कसकर,
कि चीख़ भी फुसफुसाहट बनकर रह जाए;
इतनी देर तक,
कि ख़ामोशी ही उनका धर्म मान ली जाए

और इन झूठों के बीच
एक और छल खड़ा हुआ
जिसने आसमान की ओर झंडा उठाकर
ज़मीन पर पड़ी थाली को अदृश्य कर दिया
जिसने कहा देश से प्रेम का मतलब
सत्ता से सहमति है
और असहमति में जन्मा हर प्रश्न
राष्ट्रदोह!
जिसने 'लोक' पर 'तंत्र'
के हावी होने को वैधानिक बना दिया
और नाम दिया
लोकतंत्र!
जहाँ सत्ता आँकड़ों के मुखौटों
के पीछे छिप जाती है
और योजनाओं की मोटी फ़ाइलें
मज़दूर की हथेली की दरारों को
छूने तक नहीं पहुँच पातीं।

इतिहास के ये झूठ,
धर्म की बनी हुई सरहदें,
और सत्ता की महीन परतों में छिपे छल
सब गहरे हैं, बोझिल हैं,
पर सबसे बड़ा झूठ नहीं

सबसे बड़ा झूठ तब होता है
जब हम इन बातों को
सच की तरह ओढ़ लेते हैं;
जब हम परवाने के भाँति
आग में जलने को
बिना सवाल किए
अपनी नियति मान लेते हैं;
और जब हम छाया की तरह
आकार तो पहचान लेते हैं
पर भूल जाते हैं
स्रोत की ओर देखना

सबसे बड़ा झूठ तब जन्म लेता है
जब आप टेढ़ी दुनिया को
“हमेशा से ऐसी ही थी” कहकर
सीधा मान लेते हैं
जब आपकी अपनी ही आवाज़
आपको यह सिखा देती है
कि आज़ाद सोचना अनुशासन का टूटना है,
और अन्याय के सामने चुप रहना परिपक्वता

और सबसे गहरा झूठ तब गढ़ा जाता है
जब आदमी मुस्कान का मुखौटा पहनकर
अपनी ही टूटन को प्रणाम करता है;
जब दासत्व को नियम,
और सहनशीलता को कर्तव्य मान लेता है
जब वह अपनी ही आँखों को
सच की ओर देखने से रोक देता है
जब वह डरकर नहीं
आदत से चुप हो जाता है

वहीं, उसी चुप्पी की दरार में
उस अंतिम स्वीकृति में
झूठ की सबसे पुरानी
सबसे घातक जड़ उगती है।

सबसे बड़ा झूठ वह नहीं है
जो दुनिया आपको सुनाती है
सबसे बड़ा झूठ वही होता है
जो आप खुद से बोलते हो।

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