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ग़ज़ल

हक़ की जुस्तजू नहीं

प्रतीक रंजन दफ्तुआर
Apr 4, 20261 min read

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हक़ की जुस्तजू नाहिं, ना लहू रवानी है।
बेतड़प जो कट जाए, वो भी क्या जवानी है।

ख़ौफ़-ए-मौत से ना हम, पाँव पीछे करते हैं।
क़ैद डर के साये में, क्या वो ज़िंदगानी है।

जश्न-ए-फ़तह की ज़ीनत पे न मुस्कुरा जाबिर।
हर चमकती शय आख़िर, इस जहाँ में फ़ानी है।

उसकी याद में हमने, ख़ुद को यूँ जला डाला।
राख में ढला वो भी, उसकी ही निशानी है।

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