हक़ की जुस्तजू नहीं
प
प्रतीक रंजन दफ्तुआरListen to this piece
हक़ की जुस्तजू नाहिं, ना लहू रवानी है।
बेतड़प जो कट जाए, वो भी क्या जवानी है।
ख़ौफ़-ए-मौत से ना हम, पाँव पीछे करते हैं।
क़ैद डर के साये में, क्या वो ज़िंदगानी है।
जश्न-ए-फ़तह की ज़ीनत पे न मुस्कुरा जाबिर।
हर चमकती शय आख़िर, इस जहाँ में फ़ानी है।
उसकी याद में हमने, ख़ुद को यूँ जला डाला।
राख में ढला वो भी, उसकी ही निशानी है।
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