मुख्य सामग्री पर जाएं (Skip to main content)
पुस्तक समीक्षा

निठल्ले की डायरी

टीम हि.सा.सभा
Mar 15, 20264 min read

हिंदी साहित्य के व्यंग्यात्मक शैली की यदि चर्चा की जाए तो कदाचित ही हम हरिशंकर परसाई जी का नाम न लें। परसाई हिंदी व्यंग्य साहित्य के उस आकाश में चमकते सितारे हैं, जिन्होंने हँसी के भीतर छिपी हुई गंभीरता को हमें दिखाया है। उनका व्यंग्य महज़ एक हास्य का स्रोत नहीं बल्कि हमारे समाज की मानसिकता का गहन विश्लेषण है। “निठल्ले की डायरी” उनकी ऐसी ही एक अनमोल कृति है।

'निठल्ले की डायरी' एक व्यंग्य संग्रह है जो २६ अध्यायों में विभक्त है। प्रत्येक अध्याय अलग पहलू पर प्रकाश डालता है । संग्रह का मुख्य किरदार एक निठल्ला है जो बदनाम इसलिए है कि वह धनोपार्जन हेतु कोई कार्य नहीं करता। परंतु वह एक जिज्ञासु विचारक एवं जनहितैषी है, जो दूसरों की सहायता हेतु सदैव तत्पर रहता है। निठल्ला आम आदमी की नज़र से दुनिया को देखता है और उसकी विसंगतियों पर हँसी-मज़ाक में तीखी चोट करता है। दरअसल, निठल्ला एक विरोधाभासी चरित्र है जो बाहर से निष्क्रिय दिखता है, पर भीतर से बेहद सजग और संवेदनशील है। वह समाज की सक्रियता में छिपी निष्क्रियता और अपनी निष्क्रियता में छिपी सक्रियता को उजागर करता है। अलग - अलग अध्यायों में निठल्ले के सामने अलग - अलग परिस्थितियाँ आतीं है और वह उसका प्रत्यक्षदर्शी बनता है। इसके अतिरिक्त, परसाई जी ने ‘काका’ नामक चरित्र को प्रस्तुत किया है जो एक अनुभवी व्यक्ति हैं जिनके पास निठल्ला अक्सर जाता है, जो चबूतरे पर बैठे मिल जाते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं।

निठल्ले की डायरी प्रथम दृष्ट्या आलस्य का प्रतीक है, लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं यह बात पुनः पुनः सिद्ध होती है कि यह निठल्लापन नहीं एक मौन विरोध है। आधुनिक भारत में व्यक्ति जितना व्यस्त है उतना ही खाली भी। यह पुस्तक इसी विडम्बना को कलात्मक रूप से प्रस्तुत करती है। यह रचना आत्मकथ्य और समाजकथ्य का सम्मिश्रण है। डायरी की विषयवस्तु उसके व्यक्तिगत अनुभव हैं जो समाज के द्विचरित्र को दिखाते हैं । लेखक ने इन दृष्टांतो से समाज की नौकरशाही, भ्रष्टाचार, और भाव-शून्यता का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है। उदाहरण के तौर पर एक अध्याय में संसद के काम करने की व्यवस्था पर व्यंग्य किया है जिसमें वर्तमान राजनीति एवं संगठन के पहलुओं पर कटाक्ष किया गया है। वहीं एक अध्याय में नगरपालिका के चित्रण द्वारा व्यवस्था एवं अफसरशाही पर व्यंग्य किया है। इसके अतिरिक्त लेखक ने कई सरकारी व्यवस्थाओं, जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर अस्पतालों तक सभी की कार्यशैली एवं जातिवाद और समूहवाद जैसी सामाजिक विसंगतियों पर टिप्पणी की है। परंतु लेखक ने सिर्फ़ सामाजिक पहलुओं तक सीमित न रहकर, कई आत्मीय पहलुओं को भी छुआ है जिसमें व्यक्तिगत विघटन, भ्रम, असुरक्षा एवं मध्यमवर्गीय जीवन की चिंता और रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी विडंबनाएँ शामिल हैं ।

हरिशंकर जी की लेखन शैली बहुत ही सहज, सरल और आत्मीय है। भाषा में लोक-जीवन की सजीवता है जो पाठक को बाँध लेती है, परंतु भावों में गहरी तात्त्विकता है जो उसे भीतर तक झकझोर देतें है। चूँकि यह हमारे आम जीवन की घटनाओं से प्रेरित संग्रह है तो यह हमें विचार विमर्श, तार्किक सोच के लिए प्रेरित करता है । उनके व्यंग्य में तीक्ष्णता भी है और सच्चाई भी। परसाई जी ने विसंगतियों पर बिना किसी लाग लपेट के प्रहार किया है। वे हास्य की ओट में समाज की विसंगतियों को सरलता से प्रस्तुत करने का हौसला रखते हैं। उदाहरण के तौर पर - आडंबर, दोमुँहापन, ढोंग इत्यादि उनके कलम के निशाने पर हैं। यह विशेषता आचार्य शुक्ल की उस साहित्यिक दृष्टिकोण से मेल खाती है जिसमें साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।

“निठल्ले की डायरी” समय का एक दस्तावेज़ है जो हमें बताती है कि भ्रष्टाचार, अवसरवाद और सामाजिक पाखंड कोई नई चीज़ें नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से हमारे समाज का हिस्सा रही हैं। आज के दौर में भी यह कृति उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने समय में थी। यह पुस्तक एक बहुत ही अच्छी शुरुआत है उन सब युवाओं के लिए जो व्यंग्य द्वारा गंभीर विषयों को हल्के अंदाज़ में पढ़ना चाहते हैं। हालांकि ये एक व्यंग्य संग्रह है और एक दीर्घ कथा-पड़ाव नहीं है इसलिए यह उन पाठकों को कम पसंद आ सकती है जो कहानी-कथानक की अपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कई जगह अत्यधिक प्रतीकात्मक तत्त्वों का प्रयोग हुआ है जो पाठक के प्रवाह को थोड़ा बाधित कर सकती है।

हरिशंकर परसाई जी ने हमें यह दिखाया है कि व्यंग्य सिर्फ हास्य-अंबार नहीं बल्कि वह आँखें खोलने वाला संवेदनशील अनुभव है। पुस्तक का शीर्षक शायद सुनने में आलसी लगे पर उसमें जिन घटनाओं का वर्णन है, वही हमें समाज को गहराई से देखने का मार्ग प्रशस्त करती है।

Share

Tags

vyangyaharishankar parsaibookbook reviewsameekshareview